लंकाधिपति रावण जीवन परिचय

14 November, 2021 Views - 53

रावण का नाम हिंदू धर्म में सभी लोग जानते हैं रावण को कई नामों से जाना जाता है दशानन लंकाधिपति रावण ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ था इनके पिता का नाम विश्रवा था वह शिव के परम भक्त थे रावण बहुत बड़ा विद्वान था वह चार वेद छह शास्त्रों का ज्ञाता था आज भी लंका में रावण की पूजा की जाती है। रावण त्रिलोक विजय था वहां पराक्रमी था उसके भाई से सारे देवता भी काम थे अपने अहंकार की वजह से श्रीराम द्वारा इनका अंत हुआ था।
मान्यता अनुसार रावण में अनेक गुण भी थे परम शिव भक्त ब्राह्मण पुलस्त्य ऋषि का पुत्र और विश्रवा का पुत्र महान राजनीतिज्ञ महा पराक्रमी योद्धा अत्यंत बलशाली रावण के शासनकाल में लंका का वैभव अपने चरम सीमा पर था इसलिए उसकी लंका नगरी को सोने की लंका अथवा सोने की नगरी भी कहा जाता है उसे मायावी इसीलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल तंत्र सम्मोहन और कई तरह के जादू जानता था उसके पास एक ऐसा अभिमान था जो अन्य किसी के पास नहीं था इस सभी के कारण सभी इससे भयभीत थे भगवान रामचंद्र का विरोधी और शत्रु होने के नाते रावण सिर्फ बुरा ही नहीं था वह बुरा बना तो सचमुच में ही प्रभु श्री राम की इच्छा से।
रावण मैं राक्षस सत्व था लेकिन उसके गुणों का वर्णन नहीं किया किया जा सकता ऐसा माना जाता है कि रावण शंकर भगवान का बहुत बड़ा भक्त था वह महा तेजस्वी प्रपात प्रतापी पराक्रमी रूपवान तथा विद्यमान था वाल्मीकि ने उसके गुणों की निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुए उसे चारों वेदों का विश्व विख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं वाल्मीकि रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय दिखते हैं और रूप बहुत है रे बाबू सुबह हो दतिया हो राक्षस राज यस्य सर्व विलक्षण आयुक्त लिखते हैं कि रावण को देखते ही राम मुक्त हो जाते और कहते हैं कि रूप सौंदर्य क्रांति तथा सर्व लक्षण युक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान ना होता तो यह देव लोक का स्वामी बन जाता। रावण जहां दुष्ट और पापी था वही उसके शिष्टाचार और उनके आदर्शवादी मर्यादाओं मर्यादा में भी थी राम के वियोग में दुखी सीता से रावण ने कहा था कि सी तैयारी तुम मेरे प्रति संभावना नहीं रखती तो मैं तुम्हें स्पर्श नहीं कर सकता शास्त्रों के अनुसार के बाद से ही रावण की गिनती राक्षसों में होने लगी राक्षसों की संगति से अभिमान गलत कार्य और भी बढ़ते चले गए सर आप से पहले वह ब्राह्मण था और सात्विक भी तरीके से तपस्या करता था रावण ने युद्ध में कई राजाओं को पराजित करते हुए 10 गरीब इक्ष्वाकु वंश के राजा अंजनिया के पास जा पहुंचा जो अयोध्या पर राज करते थे रावण ने उन्हें भी द्वंद युद्ध करने अथवा पराजय के लिए ललकारा।
दोनों में भीषण युद्ध हुआ पर ब्रह्मा जी के वरदान के कारण रावण उसे पराजित ना हो सका जबरन रनिया का शरीर बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो गया तो रावण इक्ष्वाकु वंश का अपमान और उपहास करने लगा इससे कुपित होकर अरणीय ने रावण को शाप दे दिया मैं तुम्हें सांप देता हूं कि महात्मा इक्ष्वाकु के इसी वंश में दशरथ नंदन राम का जन्म होगा जो तेरा वध करेगा यह कहकर राजा स्वर्ग सिधार गए।


रामायण   धर्म एवं संस्कृति   53

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