कुम्भकरण ने क्यों माँगा था ऐसा वरदान

10 February, 2022 Views - 162

कुंभकरण कौन था ? - कुंभकरण रामायण का एक मुख्य पात्र था। कुंभ का अर्थ घड़ा करण का अर्थ कान बचपन से ही बड़े कान होने के कारण उनका नाम कुंभकर्ण रखा गया था। वह ऋषि विश्रवा और राक्षसी केकसी का पुत्र तथा लंका के राजा रावण का छोटा भाई था। कुंभकरण विभीषण और सूर्पनखा का बड़ा भाई था। कुंभकरण की माता कैकसी राक्षस वंश की तथा पिता विश्रवा ब्राह्मण कुल के थे। कुंभकरण में माता-पिता दोनों के गुणों का समावेश था बचपन से ही तीनों भाइयों ने कई प्रकार की विद्या ग्रहण की कुंभकरण का शरीर अति विशाल था उसे खाने का भी बहुत शौक था कुंभकरण में कई हाथियों का बल था। वह कई गांव के लोगों का खाना एक बार ही खा जाता था। कुंभकरण के साथ बात करने के लिए भी लोगों को सीढ़ियों पर चढ़कर या घर की छत पर चढ़कर बात करनी पड़ती थी । वह अपनी हथेली पर रखकर लोगों को उठाता था कुंभकरण द्वारा मांगा गया वरदान उसके लिए अभिशाप बन गया था।
ऋषि विश्रवा के 3 पुत्र क्रमशः रावण कुंभकरण और विभीषण महा ज्ञानी तपस्वी तेजस्वी और चार वेद छह शास्त्र के ज्ञाता थे। रावण पर माता का अधिक प्रभाव था इसीलिए रावण राक्षस प्रवृत्ति का और घमंडी था। माता के किसी के मन में सत्ता एवं शक्ति का लोभ था इसलिए वह अपने पुत्र को पृथ्वी के स्वामी के रूप में देखती थी पिता विश्रवा ब्राह्मण थे जिनमें अपार ज्ञान और शालीनता थी वह अपने पुत्रों को अपनी तरह बनता देखना चाहते थे।
क्यों माँगा था ऐसा वरदान - भाई खूब तपस्वी थे तीनों ब्रह्मदेव की खूब तपस्या करते थे कुंभकरण को बहुत सारा भोजन करना चाहता था। कुंभकरण की इसी प्रकार भोजन खाने की इच्छा से देव गण भी चिंतित होने लगे इस प्रकार कुंभकरण के भोजन करने से 1 दिन पूरे संसार का भोजन ही समाप्त हो जाएगा कुंभकरण अपनी ब्रह्मदेव की तपस्या के बल पर इंद्रासन का वरदान मांगना चाह रहा था। सभी देवता मिलकर ब्रह्मा के पास जाते हैं और वहां पर माता सरस्वती इस समस्या का समाधान बताती है कि जब कुंभकरण ब्रह्मा से वरदान मांगेगा तो मैं उस समय कुंभकरण की जीवा पर बैठ जाऊंगी और वह बोल ही नहीं पाएगा जब ब्रह्मदेव कुंभकरण की तपस्या से प्रसन्न होकर कुंभकरण को दर्शन देते हैं और उसे मनचाहा वरदान मांगने के लिए कहते हैं ज्यों ही कुंभकरण वरदान मांगने के लिए मुंह खोलता है उसी समय माता सरस्वती कुंभकरण की जिव्हा पर बैठ जाती है और कुंभकरण को इंद्रासन मांगने के बजाय इंद्रासन बोला जाता है। ब्रह्मदेव कुंभकरण को तथास्तु कह देते हैं उसके बाद कुंभकरण दुखी होता है और ब्रह्मदेव के सामने पश्चाताप करने लगता है और प्रार्थना करता है कि ब्रह्मदेव उसकी मदद करें ब्रह्मदेव कहते हैं कि दिया हुआ वरदान वापस नहीं होता है। मैं तुम्हारी भक्ति से अति प्रसन्न हूं हां मैं आपके लिए इतना कर सकता हूं कि आप 6 महीने सोने के बाद 1 दिन के लिए जागोगे और फिर पूरे 6 महीने के लिए सो जाओगे और एक दिन जागोगे दुखी मन से कुंभकरण इस बात को स्वीकार कर लेता है। इस प्रकार कुंभकरण का यह वरदान उसके लिए अभिशाप बन जाता है अब कुंभकरण का जीवन इसी प्रकार चलता है वह 6 महीने सोता है एक दिन जागता है खाना खाता है और पूरे 6 महीने के लिए सो जाता है। उसे अपने सगे संबंधी परिवार के विषय में भी कोई जानकारी नहीं होती।
कैसे हुआ उद्धार - काफी समय के बाद जब उसके बड़े भाई रावण ने सीता माता का हरण किया था और राम और रावण में युद्ध हुआ था उस समय जब राम की सेना रावण की सेना पर भारी पड़ रही थी उस समय रावण को अपने महा बलशाली छोटे भाई कुंभकरण की याद आई और रावण ने कुंभकरण को जगाने की आज्ञा दी उस समय कुंभकरण को सोए हुए कम समय हुआ था कुंभकरण को जगाने के लिए उस समय हजारों नगाड़े बजाए गए कई प्रकार की आवाजें की गई कई प्रकार के पकवान बनाए गए काफी मशक्कत के बाद कुंभकरण जाग गया । जागते ही कुंभकरण ने बहुत सारा खाना खाया फिर पूछा क्या मेरे सोने के 6 महीने पूरे हो चुके हैं। लंका पर आए संकट को विस्तार से उन्हें बताया गया रावण ने कुंभकरण को आदेश दिया कि वह राम के साथ युद्ध करने के लिए जाए अन्यथा विभीषण की भांति वह भी उसका साथ छोड़ सकता है। कुंभकरण जानता था कि मेरे बड़े भाई रावण ने गलत कार्य किया है लेकिन कुंभकरण भ्रातृ प्रेम की वजह से युद्ध भूमि में गया और कुंभकरण को यह भी मालूम था कि श्री राम विष्णु के अवतार है उनके हाथों मरना जीवन के लिए अति उत्तम है इस प्रकार जब कुंभकरण युद्ध भूमि में युद्ध करने के लिए आया तो कुंभकरण ने राम की वानर सेना में खलबली मचा दी कुंभकरण वानर सेना को चीटियों की भांति अपने पैरों तले कुचल रहा था। वानर सेना में हाहाकार मच गया युद्ध में जब कुंभकरण आगे बढ़ रहा था तो उसकी भेंट अपने छोटे भाई विभीषण से होती है विभीषण कुंभकरण को श्री राम की शरण में आने को बोलता है लेकिन कुंभकरण विभीषण को अपमानित करता है उसे कुल द्रोही बताता है भ्रातृ प्रेम मोह में कुंभकरण इस कठिन समय में रावण का ही साथ देता है। जब श्री रामचंद्र को इस बात का पता चलता है कि कुंभकरण मेरी सेना को पूरी तरह से कुचल रहा है तो श्री राम स्वयं युद्ध में आकर कुंभकरण पर बाण चलाते हैं जिससे कुंभकरण वीरगति को प्राप्त होता है मरते वक्त भी कुंभकरण भगवान राम को प्रणाम करता है क्योंकि उसे पता था उसका उद्धार भगवान श्री राम के द्वारा ही होना था।


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