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कर्ण - महाभारत का एक दानवीर योद्धा

01 June, 2021 Views - 252

महाभारत के कर्ण एक ऐसे योद्धा थे जिनके विषय में लोगों की अलग-अलग भ्रांतियां है कुछ लोग करण को अधर्म का साथ देने वाला योद्धा मानते हैं तो कुछ लोग अपने वचनों को निभाने वाला मानते हैं।

जन्म - कर्ण के जन्म की भी विचित्र घटना है कर्ण ने कुंवारी मां कुंती के गर्भ से जन्म लिया जो कि दुर्वासा ऋषि की सेवा के पश्चात इस बालक को जन्म सूर्य भगवान की कृपा से हुआ लेकिन लोक लाज के भय से कुंती ने उस बालक को टोकरी में रखकर नदी में बहा दिया यह बालक जन्म के समय ही बहुत तेजस्विता जन्म के समय ही करण के शरीर में कवच और कुंडल थे कुछ और कुंडल का अभिप्राय था कि यह बालक बड़ा होकर महान योद्धा बनेगा इस योद्धा को युद्ध में कोई नहीं हरा सकेगा ना ही इस युद्ध की मृत्यु होगी लेकिन इंद्रदेव ने भिक्षु बनकर दान में करण से कवच और कुंडल ले लिए हालांकि सूर्यदेव ने कर्ण को कुछ और कुंडल देने से सावधान कर दिया था कर्ण सूर्य देव की पूजा करने के पश्चात किसी भी भिक्षा मांगने वाले को खाली हाथ नहीं छोड़ता था वह भिक्षा मांगने वाला चाहे करण के प्राण भी मांग देता तो कल उसे खुशी-खुशी अपने प्राण भी दे देता। जब कुंती ने उसे अपने उस जिगर के टुकड़े को टोकरी में रखकर नदी में बहाया तो संयोगवश नदी किनारे राष्ट्र के साथी अधि अधि रत अधिरथ और उनकी पत्नी कपड़े धो रहे थे उन्होंने बालक के रोने की आवाज सुनी और नदी में देखा एक बालक टोकरी में तैर रहा है तीरथ ने बिना देर किए टोकरी को पकड़ लिया घर लाकर उस बालक का पालन पोषण किया उस बालक को उन्होंने भगवान की कृपा माना क्योंकि उनके कोई संतान नहीं थी और वह सूट वर्ण से थे इसलिए करण को सूत पुत्र भी कहा जाता है वास्तव में कर्ण के पिता भगवान सूर्य थे कर्ण की वास्तविकता माता कुंती ने बाद में विवाह के पश्चात पांच पांडव को जन्म दिया बहुत ही कम लोग जानते हैं कि कल मैं अकेली ही पांचों पांडवों के सभी गुण विद्यमान थे वह दानवीर अर्जुन की तरह तीरंदाज भीम की तरह बलवान नकुल की तरह तलवार तलवार बाज और सहदेव की तरह बेहतरीन घुड़सवार थे ।

धनुर्विद्या - करण को बचपन से ही धनुर्विद्या का काफी शौक था इसको सीखने के लिए करण को इनके पिता अधिरथ ने निपुण धनुर्विद्या गुरु द्रोणाचार्य के पास ले गए लेकिन उन्होंने करण को धनुर्विद्या देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह केवल राजघराने के बालकों को ही धनुर्विद्या का ज्ञान देते थे अधि रत सूत वर्ग से थे इसीलिए करण भी सूट वर्ग के हुए जो कि निम्न वर्ग था फिर करने ब्रह्मपुत्र ब्राह्मण पुत्र बंद कर परशुराम के आश्रम में धनुर्विद्या सीखी और श्रेष्ठ धनुर्धर की ख्याति पाई एक बार जब द्रोणाचार्य राज्यसभा में अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को संसार का श्रेष्ठ धनुर्धर घोषित कर रहे थे तो उस राज्य सभा में कर्ण ने अर्जुन को ललकारा की अर्जुन मेरे साथ युद्ध करें करण ने द्रोण से कहा मुझे केवल एक कमी है मैं आपका शिष्य नहीं हूं यदि मैं आपका शिष्य होता तो गुरु दक्षिणा में आप आपने मेरे दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया होता सभी राज्यसभा में शब्द रह गए इस पर द्रोणाचार्य ने कर्ण से उनका परिचय मांगा करने अपना परिचय अपने धनुष और तीर को ही बताया उसी समय दुर्योधन ने भरी सभा करण को अब देश का राज्य भेंट कर दिया इसीलिए करना हमेशा हमेशा के लिए दुर्योधन के हो गए।

करण की मृत्यु - महाभारत के युद्ध में कर्ण अपने घनिष्ठ मित्र दुर्योधन के साथ थे और उन्होंने पांडवों के साथ युद्ध लड़ा महाभारत युद्ध से कुछ दिन पहले करण को योग ज्ञात हो चुका था कि उनकी माता भी कुंती ही है जो पांच पांडवों की भी है अर्थात कर्ण पांडवों के जेष्ठ भ्राता है यहां रहस्य स्वयं कुंती ने उन्हें बताया और भगवान श्री कृष्ण ने भी करण को यही रहस्य बताया और पांडवों के शिविर में लौटने को कहा और दुर्योधन के साथ युद्ध करने की विनती की जिससे कर्ण का मनोबल बिल्कुल गिर गया माता कुंती को तो करने बताया हे माता मेरा युद्ध केवल अर्जुन से ही होगा युद्ध में या तो अर्जुन मारा जाएगा या में लेकिन आप के पांच पुत्रों की संख्या नहीं घटेगी युद्ध से पहले यह बात केवल महाभारत के 4 पात्रों को ही मालूम थी कि कर्ण कुंती कुंती पुत्र है वह थे भगवान श्री कृष्ण कुंती पितामह भीष्म और कर्ण महाभारत में पितामह भीष्म जब को कौरव सेना के प्रधान सेनापति थे तो उन्होंने करण को अपने भीतर युद्ध लड़ने से इंकार कर दिया इस प्रकार वह पिता महा विष्णु की मृत्यु शैया पर पढ़ने के बाद कौरव सेना के प्रधान सेनापति बने कर्ण ने अर्जुन के साथ युद्ध लड़ा बाकी पांडवों को सामने होते हुए भी उन्होंने नहीं मारा अर्जुन के साथ युद्ध लड़ते लड़ते कर्ण के रथ का पहिया धरती में 10 गया और कर्ण ने अर्जुन को बताया कि मैं रथ का पहिया निकाल रहा हूं इस समय बाण मत चलाना करण रथ का पहिया निकालने के लिए धरती पर उतर गया और वह निकालने लगे अर्जुन अपने रथ पर खड़े हो गए इतने में श्रीकृष्ण जी अर्जुन के साथ ही थे उन्होंने अर्जुन को बताया कि हे पार्थ देख क्या रहे हो तीर्थ लाओ अर्जुन ने श्रीकृष्ण को कहा युद्ध नियमों के विरुद्ध है श्रीकृष्ण ने बताया कि करण ने कब युद्ध नियमों का पालन किया 4 दिन पहले की बात है जब आप के पुत्र अभिमन्यु पर वार किया था और भारी सभा में द्रौपदी को वेश्या कहा था इसी के उपरांत अर्जुन ने अपना दिव्य अस्त्र करण पर चला दिया करत का पहिया जमीन से निकाल रहा था उसी समय अर्जुन ने दिव्यास्त्र से करण का सिर धड़ से अलग कर दिया और कर्ण की मृत्यु हो गई श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि करण ने अधर्मी दुर्योधन का साथ दिया है इसलिए यह भी उतना ही पाप का भागी है जितना दुर्योधन।


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