कैसे बने शुक्राचार्य राक्षसों के गुरु

10 February, 2022 Views - 195

शुक्राचार्य कौन थे ? शुक्राचार्य राक्षसों के गुरु थे उनके पिता का नाम भृगु ऋषि और माता का नाम ख्याति था। शुक्राचार्य को एकाक्ष भी कहा जाता है। शुक्राचार्य का बचपन का नाम उशना था। एकाक्ष का अर्थ होता है एक आंख वाला अर्थात शुक्राचार्य । राजा बलि को सचेत करने के लिए शुक्राचार्य जल पात्र की टोटी में बैठ गए थे। राजा बलि ने सींक को जल में डालकर देखना चाहा कि इसमें क्या है इसी समय शुक्राचार्य की एक आंख फट गई शुक्राचार्य ने भगवान शिव को अपना गुरु मान लिया था उन्होंने शिव की घोर तपस्या करके अमृत संजीवनी विद्या प्राप्त कर ली। शुक्राचार्य ने इसी विद्या से कई बार मृत राक्षसों को जीवित किया और देवताओं से युद्ध में जीत प्राप्त की। असुरों के गुरु होने के नाते इन्हें असुर आचार्य भी कहते हैं।

शुक्राचार्य को क्यों बनना पड़ा असुरों का गुरु शुक्राचार्य का जन्म शुक्रवार को हुआ इसीलिए इनके पिता महर्षि भृगु ने इनका नाम शुक्र रखा था शुक्र जब बड़े हुए तो उनके पिता ने उन्हें ब्रह्म ऋषि अंगद ऋषि के पास शिक्षा के लिए भेज दिया । अंगद ऋषि ब्रह्मा के मानस पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ थे और उनके एक पुत्र बृहस्पति थे जो बाद में देवों के गुरु बने। शुक्राचार्य और बृहस्पति एक साथ पढ़ते थे। शुक्राचार्य का दिमाग बृहस्पति की तुलना में अधिक कुशाग्र था। बृहस्पति को अगर ऋषि के पुत्र होने के कारण अधिक शिक्षा मिलती थी शुक्राचार्य ने ईर्ष्या के कारण उस आश्रम को छोड़ दिया और गौतम ऋषि से शिक्षा लेने लगे। शिक्षा पूर्ण होने के बाद जब शुक्राचार्य को पता चला कि बृहस्पति को देवो ने अपना गुरु नियुक्त किया है तो फिर से अवश्य शुक्राचार्य ने भी मन में अपने आपको दैत्यों का गुरु बनाने की ठान ली इसी प्रकार असुरों की भलाई के लिए शुक्राचार्य ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। भगवान शिव ने शुक्राचार्य को अमृत संजीवनी का वरदान दिया कि तुम युद्ध में देवताओं को पराजित कर दोगे और तुम्हें कोई पराजित नहीं कर सकेगा ना ही तुम्हें कोई मार सकेगा। इस विद्या की मदद से वह किसी भी मृत अतुल को जीवित कर सकते थे। इस प्रकार जब शुक्राचार्य तपस्या में लीन थे। इस प्रकार जब शुक्राचार्य तपस्या में लीन थे तो देवों ने दैत्यों का नाश करना शुरू कर दिया कुछ दैत्यों ने अपनी जान बचाकर शुक्राचार्य की मां और भृगु ऋषि की पत्नी ख्याति की शरण में जा कर अपनी जान बचाई जो भी देवता और दैत्य को मारने आता ख्याति उन्हें मूर्छित करती या लकवा ग्रस्त करती इस प्रकार देवों की संख्या कम होती गई और दैत्यों की संख्या बढ़ती गई इस बात का पता जब विष्णु भगवान को चला तो उन्होंने ख्याति की गर्दन सुदर्शन चक्र से काट डाली और सृष्टि का संघार होने से बचा लिया जब यह बात भृगु ऋषि को पता चली कि विष्णु भगवान ने उनकी पत्नी का वध कर दिया है उन्होंने विष्णु भगवान को शाप दे दिया कि अब भगवान विष्णु को संसार में जन्म लेने के लिए मां की कोख से जन्म लेना पड़ेगा ताकि कोख की पीड़ा को विष्णु भगवान भगवान महसूस कर सके। पहले विष्णु का अवतार मत्स्य अवतार नरसिंह अवतार और सर्प अवतार के रूप में होता था श्राप के बाद श्री कृष्ण, राम इत्यादि विष्णु अवतार को मां की कोख से जन्म लेना पड़ा इस बात का पता जब शुक्राचार्य को जला कि मेरी मां ख्याति का वध विष्णु भगवान ने किया शुक्राचार्य बहुत क्रोधित हुए और अपनी मां के वध का बदला लेने की ठान ली तब से शुक्राचार्य और विष्णु भगवान ने में दुश्मनी हो गई और अमृत संजीवनी से व्यक्तियों को जीवित किया और दैत्यों की नगरी बसा दी । इस प्रकार अपनी मां के वध का बदला ले लिया।

शुक्राचार्य की मृत्यु शुक्राचार्य और दैत्यों ने मिलकर पृथ्वी पर देवों का वध करके हाहाकार मचा दिया तो शिवजी क्रोध में आए और शुक्राचार्य को पकड़कर निगल डाला।


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